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उबलते पानी के मेंढ़क





Synopsis

इक्कीस दिन में इक्कीस कविताएँ लिखना, यह कोई आसान काम नहीं था। यह मेरा पहला एक्सपेरिमेंट है हिंदी के साथ, और, वो भी एक चैलेंज के रूप में।


उबलते पानी के मेंढ़क, समसामयिक घटनाओं एवं ज्वलंत मुद्धों पर मेरे विचारों से अवगत कराती इक्कीस कविताओं का संग्रह है। रोज़मर्रा की सरल भाषा में लिखी कविताओं में हर उम्र का पाठक अपने आप को वर्णित होता देखता है। कहीं ना कहीं उसके अपने जीवन में घटी परिस्थितियों का वर्णन होता देख, पाठक बार-बार इन कविताओं को गुनगुनाता है, जीता है, और आने वाले कल को बेहतर बनाने की कल्पना करता है। ‘द बुक लीफ़’ ने सब कुछ बहुत आसान बना दिया है— किसी को भी अपने मन की बात रखने का एक खूबसूरत ज़रिया दिया, किताबों के द्वारा। मैं ‘द बुक लीफ़’ का आभारी हूँ, मुझे ये मौक़ा देने के लिए। ईश्वर की कृपा से अब, मैं एक फ़िक्शन लेखक और कहानीकार के साथ-साथ, एक कवि भी बन गया।


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पेश है कुछ पंक्तियाँ…

उबलते पानी के मेंढक


पहले चांद तारे कम दिखते थे
अब तो सूरज भी छुप जाता है, दिन-दहाड़े
कभी पराली के धुएँ में
कभी फैक्टरी के धुएँ में
कभी पेट्रोल, डीज़ल के धुएँ में
कभी ट्रैफिक, तो कभी टूटती इमारतों के मलबे से
उठते हुए मिट्टी के गुब्बार में
ओढ़ लेता है एक काली चादर सूरज भी
ए.क्यू.आई. रोज़ नए कीर्तिमान बनाती है
एयर-प्यूरीफायर के बिना दम घुटता है
फेफड़े काले पड़ गए हैं, नन्हे बच्चों के भी
ग्लोबल-वार्मिंग महसूस कर रहा है हर कोई
पर एक आदत सी पड़ गई है बर्दाश्त करने की
सब चुप हैं,
आंच पे पड़े धीरे धीरे
उबलते पानी के मेंढ़क की तरह,
अनभिज्ञ की एक दिन धीरे-धीरे उबलता पानी जान ले लेगा


मकसद जिंदगी का


पैसा कमाने में माहिर हो गया,
तो लगा यही मकसद है जीवन का
याद ही न रहा, कैसे सफर तय किया
बचपन से जवानी का
अब तो राहें खुद-ब-खुद ढूंढ लेती हैं मंज़िल
सलीका आ गया है, कम मेहनत में भी खूब कमाने का
नकल कर लिया है मैंने भी तरीका जमाने का
आदत सी हो गई है अब ऐशो आराम की


मैं सूर्य हूँ


मैं सूर्य हूँ —
अजर, अमर, अचल, शाश्वत, अभेद्य।
सृष्टि का केंद्र बिंदु,

मुझसे ही पाते प्राण वृक्ष, पौधे
पक्षी, जानवर, मनुष्य
अन्यथा सब शून्य, शिथिल, निष्प्राण मेरे बिना

ऊर्जा का मैं अंतिम स्रोत
सबको दिखता, सब कुछ मैं ही दिखाता
अन्यथा केवल अंधकार ही हो मेरे बिना






Readers' Reviews

“Thought-provoking. Beautiful compilation of experiences and excellent expressions.”

...Deepak Malik

“Jese gaagar mein saagar...so much depth and touching thought...feeling overwhelmed ... bahut time ke baad kuchh sochne par majboor karne vaala text aur vo bhi itni soft aur simple beautiful kamaal ki Kavita se...bahut achcha lagaa...heartiest congratulations”

... Shradhya Arya